बोल के लब आज़ादविचार

आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे….

आवेश तिवारी (वरिष्ठ पत्रकार)

अपने शायर अपने कवि की अंगुलियों को चूमो। याद करो जब वह तुम्हारे घर आता था तो घर के बाहर की घास कैसे तन कर खड़ी हो जाती थी। वो घर से अलविदा कहते हुए निकल जाए तो शाम के ढलते हुए सूरज को देखो, तुम्हे अपने शायर का चेहरा उस सूरज के जैसे दिखाई देगा। अपनी आंखों को बंद कर सूरज के सामने सिर झुका लो।

अपने शायर की शायरी पर अंगुलियां फिराओ, उसके शब्दो को मंत्रों की तरह उच्चारित करो।उसकी तरह मुस्कुरा कर देखो उसकी तरह चलने की कोशिश करो। देखो यह जरूरी है कि वो जिन बातों पर नाराज होता हो तुम भी उन बातों पर नाराज होवो। मुमकिन हो तो तुम भी पढो जैसे वो पढ़ता था।

शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम,

आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

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न्यूज़ डेस्क, उर्जांचल टाईगर

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