विचार

….कहीं देश-द्रोह या राज-द्रोह न कह दिया जाय।

लेखक - डॉ रामेश्वर मिश्र

पिछले कुछ दिनों से भारत का अन्नदाता सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर बैठा है, सरकार से नई कृषि नीति के वर्तमान मसौदे में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव को लेकर किसानों की सरकार से अपेक्षा है। बहुत ही कम अवसर आये हैं जब खेतों में गर्मी, सर्दी और बारिस की रातों में लगन एवं तत्परता से कार्य करने वाला किसान सरकार की नीतियों के विरुद्ध सड़कों पर उतरा हो।

खलिस्तानी,पाकिस्तानी,चीनी परस्त कहना सियासत का हिस्सा 

आज जब किसान आन्दोलन सरकार के विरुद्ध हो रहा है तो विरोध कर रहे दस हजार किसानों पर मुकदमा दर्ज किया गया, दिल्ली की सिंधु एवं टिकरी सीमा पर 26-27 नवम्बर को किसानों को रोकने के लिए बर्बर तरीके अपनाये गए, इस पर भी किसान जब अपने माँगों की पूर्ति हेतु दिल्ली आ ही गए तो सरकार द्वारा यह दुष्प्रचार किया जाने लगा कि ये किसान नही हैं यह खलिस्तानी समर्थक लोगों का हुजूम है जिनकी मंशा देश में शांति व्यवस्था को कमजोर करना है,सरकार कि नीतियों का विरोध करने वालों को इसी प्रकार से खलिस्तानी, पाकिस्तानी, चीनी परस्त कहना राजनैतिक सियासत का एक हिस्सा हो गया है। ऐसे में यह विषय बहुत ही प्रासंगिक हो जाता है कि आम जनमानस अपने ही देश में अपने ही लोगों से क्यों डर रहा है, सरकार द्वारा अनेक ऐसी नीतियाँ अपनायी जा रही हैं जिससे यह कहना सार्थक होगा कि भारतीय समाज को अनेक उत्पीड़नों का सामना आने वाले दिनों में करना पड़ेगा।

किसान

….कहीं देश-द्रोह या राज-द्रोह न कह दिया जाय।

सरकार एवं जनता के बीच असमंजस एवं शंका की भावना एक बड़े विद्रोह को जन्म देती है, वर्तमान सरकार एवं जनता के बीच उपजे अविश्वास एवं भय के लिए सरकार की दो नीतियाँ उत्तरदायी हैं, पहला वर्तमान समय में सरकार द्वारा तेजी से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण करना और दूसरा सरकार द्वारा विरोध एवं विरोधियों के दमन के लिए बर्बर तरीके का इस्तेमाल करना। भले ही सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में निजी कंपनियों के बढ़ते स्वामित्व का आम जनमानस द्वारा कहीं तेजी से विरोध देखने को नही मिला परन्तु इस समय सरकार द्वारा नई कृषि नीति के माध्यम से निजी कंपनियों को कृषि क्षेत्र में अधिकार देने का प्रयास किया जा रहा है और अपनी जिम्मेदारियों एवं कर्तव्यों से मुख मोड़ने से किसानों एवं सरकार के बीच उपजे अविश्वास का प्रतिफल ही किसान आन्दोलन बन गया परन्तु आज इस बदलते दौर में देश का हर नागरिक यह सोचने पर विवस है कि उसके द्वारा सरकार के विरुद्ध किये जा रहे विरोध को कहीं देश-द्रोह या राज-द्रोह न कह दिया जाय। देश में इस समय दो प्रकार से जनमानस को दमन करने का प्रयास वर्तमान सरकार द्वारा किया जा रहा है। पहला सरकार की नीतियों के विरुद्ध बोलने वालों को देश-द्रोही कहा जा सकता है या बड़े पैमाने पर समाज द्वारा विरोध किये जाने पर यह कहा जा सकता है कि यह विरोध पाकिस्तान की साजिश है, इस विरोध के लिए चीन से फंडिंग हुई है, ऐसे अनेक आरोप लगाए जा सकते हैं, जिसे आज किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में समझा जा सकता है।

दो साल में राजद्रोह के मामले दोगुने हो गए।

आज हम सरकार की नीतियों का पिछले कुछ वर्षों में अवलोकन कर यदि देश-द्रोह की ही बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार सन 2104 में देश द्रोह के 47 मामले सामने आये जिनमे सर्वाधिक 28 गिरफ्तारियां की गयी। इसके साथ ही साथ सन 2014 से 2016 के बीच देश-द्रोह के कुल 112 मामले दर्ज किये गए और करीब 179 लोगों को गिरफ्तार किया गया जबकि देश-द्रोह के आरोप के अस्सी फीसदी मामलों में सरकार चार्ज सीट भी दाखिल नही कर पायी और सिर्फ दो लोगों को ही सजा मिली। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने साल 2018 में आकड़ें जारी किये जिसके मुताबिक दो साल में राजद्रोह के मामले दोगुने हो गए। सन 2016 में राजद्रोह के कुल मामले 35 थे जो सन 2018 में बढ़कर 70 हो गए। राष्ट्र के खिलाफ कुछ बोलने या ऐसे आपराधिक कार्य करने जिससे राष्ट्र की आंतरिक सम्प्रभुता को खतरा हो या राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को खतरा हो तो सरकार द्वारा निश्चित तौर पर उक्त दंड का प्रावधान न्यायसंगत होगा परन्तु आज के दौर में सरकार द्वारा राजद्रोह और देशद्रोह जैसे संगीन धाराओं का प्रयोग अपने नीतियों एवं योजनाओं के विरुद्ध उठने वाली आवाजों को दबाने की लिए किया जा रहा है। सरकार द्वारा इस प्रकार के विरोध को दबाने के लिए नए नए राजनैतिक हथकंडो को अपनाया जा रहा है, विरोध करने वाले वर्ग की राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय भावनाओं को संदेहप्रद बताने का प्रयास किया जाता है, इन परिस्थितियों में यह कहना गलत नही होगा कि अपने ही घर में अपने लोगों से भय लगता है।

लोकतंत्र के नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है

वर्तमान समय में सरकार की नीतियाँ एवं उत्तरदायित्व बदल गए हैं, सरकार द्वारा आम जनमानस के विकास के लिए नई नीति के सृजन, नए रोजगार के अवसर के सृजन हेतु दृढ़संकल्पता, राष्ट्र सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों के बजाय जनता का उत्पीड़न किया जा रहा है, कुछ उधोगपतियों के हितों के लिए नीतियाँ बनायी जा रही हैं जिसके फलस्वरूप आज देश का किसान सरकार के विरुद्ध सड़कों पर बैठा दिखाई दे रहा है, जहाँ पूर्व की सरकारों द्वारा ‘जय जवान जय किसान’ की आवाज बुलंद की जाती थी वहीं आज सरकार द्वारा किसानों का बर्बरतापूर्ण दमन सरकार की नियत एवं नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त है। सरकार की इन्ही नीतियों के फलस्वरूप लोकतंत्र के नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है जिसके मूल में निहित है नागरिकों में समानता का विकास, आर्थिक संवृद्धि और विकास, असमानता एवं गरीबी में कमी, नागरिकों की गरिमा और आजादी का विकास करना परन्तु आज इन लक्ष्यों के इतर कार्य करने से सरकार एवं जनता के बीच बढ़ रहा अविश्वास एक अनजाने भय को रेखांकित करता है। सरकार की नई-नई नीतियों से ही देश का नागरिक डर रहा है, नई कृषि नीति के फलस्वरूप किसानों को डर है कि आने वाले दिनों में निजी कंपनियों का कृषि क्षेत्र पर एकाधिकार होगा और किसान धीरे-धीरे अपने कृषि भूमि के स्वामित्व से वंचित हो जायेगा तिस पर सरकार की विरोध एवं विरोधियों के विरुद्ध अपनायी जा रही दमनकारी नीति, राजद्रोह एवं देशद्रोह जैसे संगीन धाराओं का प्रयोग, विरोध प्रगट करने वाले वर्ग को पाकिस्तान, खलिस्तान, एवं चीन से जोड़ना आदि ऐसे प्रमुख तथ्य हैं जो अपने ही घर में अपनों से डर का माहौल उत्पन्न करता है।

न्यूज़ डेस्क, उर्जांचल टाईगर

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