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किसान बिल 2020 पर देश के किसानों के विरोध की असल वज़ह क्या? जानिए सब कुछ आसान भाषा में।

मोदी सरकार के किसानों से जुड़े तीन बिल (विधेयक) राज्यसभा और लोक सभा पारित होने के बाद सियासत अपने पूरे सबाब पर है। विपक्ष के अलावा कई सियासी दल इसका विरोध कर रहे हैं।एनडीए गठबंधन का हिस्सा रहे शिरोमणि अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल ने इन विधयकों को लेकर केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा तक दे दिया है। देश भर में किसान किसान इसका विरोध कर रहे हैं। आपके मन में भी यह सवाल कौंध रहा होगा कि आखिर किसानों से जुड़े तीन बिल (विधेयक) क्या है? क्या वाकई किसानों का हक़ छीन रही है मोदी सरकार? आइए, जानते हैं सब कुछ आसान भाषा में।

किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल-2020

इस बिल के अनुसार किसान अपनी फसल देश के किसी भी राज्य में बगैर हस्तक्षेप के खरीद और बेच सकते हैं। अर्थात एग्रीकल्चर मार्केटिंग प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी (Agriculture Marketing Produce Committee) (APMC) के दायरे से बाहर भी फसलों की खरीद-बिक्री संभव है। साथ ही फसल की बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। ऑनलाइन बिक्री की भी अनुमति होगी। इससे किसानों को अच्छे कीमत मिलेंगे।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल –2020

करीब 65 साल पुराने वस्तु अधिनियम कानून 1955 में बना था,जिसमें संशोधन किया गया है। इस बिल के अनुसार अनाज, दलहन, आलू, प्याज समेत कुछ खाद्य वस्तुओं (तेल) आदि को आवश्यक वस्तु की लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। बेहद जरूरी होने पर ही इन पर स्‍टॉक लिमिट लगाई जाएगी। ऐसी स्थितियों में राष्‍ट्रीय आपदा,सूखा जैसी अपरिहार्य स्थितियां शामिल हैं। प्रोसेसर या वैल्‍यू चेन पार्टिसिपेंट्स के लिए ऐसी कोई स्‍टॉक लिमिट लागू नहीं होगी। उत्पादन, स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन पर सरकारी नियंत्रण खत्म होगा। सरकार का तर्क है कि इससे प्राइवेट इन्वेस्टर्स को व्यापार करने में आसानी होगी और सरकारी हस्तक्षेप से मुक्ति मिलेगी।

मूल्य आश्वासन तथा कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल -2020

देशभर में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग (अनुबंध कृषि) को लेकर व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है। फसल खराब होने पर उसके नुकसान की भरपाई किसानों को नहीं बल्कि एग्रीमेंट करने वाले पक्ष या कंपनियों को करनी होगी। किसान कंपनियों को अपनी कीमत पर फसल बेचेंगे। इससे किसानों का मुनाफ़ा बढ़ेगा और बिचौलिया राज खत्म होगा।

बिल पर विरोध क्यों

विरोध की सबसे बड़ी वजह एमएसपी एपीएमसी यह है। किसानों को आशंका है की सरकार बिल की आड़ में न्यूनतम समर्थन मूल्य वापस लेना चाहती है। कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के संबंध में कोई व्याख्या नहीं है कि मंडी के बाहर जो खरीद होगी वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे के भाव पर नहीं होगी।

कमीशन एजेंटों को डर सता रहा है कि नए कानून से उनकी कमीशन से होने वाली आय बंद हो जाएगी। कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 में कहा गया है कि किसान अब एपीएमसी मंडियों के बाहर किसी को भी अपनी उपज बेच सकता है, जिस पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, जबकि एपीएमसी मंडियों में कृषि उत्पादों की खरीद पर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मंडी शुल्क व अन्य उपकर हैं। इसके चलते आढ़तियों और मंडी के कारोबारियों को डर है कि जब मंडी के बाहर बिना शुल्क का कारोबार होगा तो कोई मंडी आना नहीं चाहेगा।

राज्य सरकारों को भी चिंता है कि जब किसान मंडियों के बाहर फसल बेचेंगे, तब उनके राज्य का राजस्व घटेगा।

किसानों के महत्वपूर्ण सवाल

किसानों का मानना है की मंडियों से बाहर खरीद की व्यवस्था अगर इतनी ही अच्छी थी तो बिहार के किसान आज तक समृद्ध क्यों नहीं हुए? वहां 2006 से यह व्यवस्था लागू हो चुकी है जो अब देशभर में करने की तैयारी है, लेकिन बिहार के किसानों की स्थिति इतनी खराब है कि वहां का चार एकड़ का किसान भी पंजाब के दो एकड़ के किसान के खेत में मजदूरी करने आता है। इसका मुख्य कारण यही है कि वहां किसानों को एमएसपी नहीं मिलता।

सरकार का कहना है एमएसपी की व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं होने वाली है। लेकिन प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है एमएसपी की व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं कर रही तो हमारी छोटी-सी मांग मान लें और एमएसपी की गारंटी का कानून बना दें। कानून में बस इतना लिख दें कि एमएसपी से कम दाम पर खरीदना अपराध होगा, हम लोग कल ही अपना आंदोलन वापस ले लेंगे।

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अब्दुल रशीद

Abdul Rashid is a well-known Journalist, Political Analyst and a Columnist on national issue. Cont.No.-7805875468, Email - editor@urjanchaltiger.in

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