मध्यप्रदेशराजनीतिविचार

शिव की सरकार में महाराज का “राज”

गुरुवार 02 जुलाई 2020 को मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान कैबिनेट का विस्तार हो गया, इस विस्तार में 14 ऐसे मंत्री बनाए गए जो विधायक नहीं हैं। कुल मिलाकर शिवराज़ मंत्रिमंडल में 14 मंत्री ऐसे हैं, जिन्हें अपना मंत्री पद बचाए रखने के लिए आने वाले तीन महीने में अनिवार्य रूप से विधानसभा का सदस्य बनना होगा।देश के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका है जब किसी प्रदेश की मंत्रिपरिषद में 40 फ़ीसदी मंत्री ऐसे हैं, जो विधायक नहीं हैं। इसे लोकतंत्र की विडंबना ही कहा जा सकता है।

मंत्री बनने वाले सभी पूर्व विधायक, भाजपा के वो नए नवेले सदस्य हैं जो कांग्रेस छोड़ कर आए हैं। इस कैबिनेट में महज साढ़े तीन महीने पहले कांग्रेस छोडकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक मंत्रियों की संख्या ग्यारह हो गई है।जिसमें 09 मंत्रियों ने इस विस्तार में शपथ लिए हैं और उनके दो समर्थक पहले ही मंत्री बनाए जा चुके हैं। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश की सरकार में अब मुख्यमंत्री सहित 34 मंत्रियों में एक तिहाई मंत्री सिंधिया समर्थक हो गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है क्या मुख्यमंत्री शिवराज़ सिंह चौहान वाकई इस टीम को अपनी टीम कह सकते हैं? क्या इस टीम में उनकी मर्जी के सिपहसालार शामिल किए गए हैं?

बहरहाल पार्टी के तरफ से कद्दावर नेताओं को जिस तरह से नज़र अंदाज़ कर सिंधिया को महत्व दिया गया उससे साफ़ है की सिंधिया के साथ कांग्रेस छोडने वाले जो विधायक मंत्री नहीं बन पाए हैं,उन्हें अब निगम और मंडलों का अध्यक्ष/उपाध्यक्ष बना कर ऐडजेस्ट किया जा सकता है।

विष अकेले ‘शिव’ को पीना पड़ता है। 

CM शिवराज ने अपने पसंद के नेताओं को मंत्री बनाने के लिए हरसंभव कोशिश की,लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के आगे एक न चला। ऐसा केवल शिवराज ही नहीं, प्रदेश भाजपा के अन्य क्षत्रपों को भी यही हालत है। नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा जैसे कद्दावर नेताओं को भी कैबिनेट विस्तार में कम से संतोष करना पड़ा है।

अपने क़रीबी और पुरानी सरकार में मंत्री रहे नेताओं को इस सरकार में जगह न दिला पाने का दर्द, नए मंत्रियों की सूची को दिल्ली से हरी झंडी मिलने के बाद बुधवार शाम को ही छलका और उन्होंने साफ़ कहा कि ”समुद्र मंथन में जो अमृत निकलता है वह सभी बंटता है और विष अकेले ‘शिव’ को पीना पड़ता है। ” उनका यह बयान इस बात का ही संकेत था कि मंत्रियों के चयन में शीर्ष नेतृत्व ने उनको महत्व नहीं दिया ।

बुधवार को ही शिवराज़ के शायराना अंदाज में किए ट्वीट जिसमें उन्होंने कहा था, ”आए थे आप हमदर्द बनकर, मगर रह गए सिर्फ़ रहजन बनकर । पल-पल रहजनी की है आपने इस कदर कि आपकी यादें रह गई हैं दिल में जख़्म बनकर।” शिवराज का यह ट्वीट किस के लिए है,और क्यों है ?क्या यह मंत्रियों के चयन में उनसे ज्यादा सिंधिया के जिद को महत्व मिलने से आहत होना नही झलकाता?

सियासी मजबूरी

22 विधायकों के कांग्रेस छोड़ने के बाद उनकी सदस्यता रद्द हो गई । दो सीट विधायकों के निधन से खाली हुईं । अब जिन 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से 16 ज्योतिरादित्य सिंधिया के मजबूत गढ़ में हैं । पार्टी बदलने वाले विधायक अपने जनाधार के दम पर चुनाव जीतने की हालत में नहीं दिखते, यानी भाजपा जानती है कि सिंधिया को नाराज करके वो उपचुनावों में अपना जीत का परचम नहीं लहरा सकती ।

मौजूदा विधानसभा में कुल 230 सीट है और बहुमत के लिए 116 सीट आवश्यक है। भाजपा के 106,कांग्रेस के 92,और अन्य के 7 हैं। उपचुनावों में 10 से ज्यादा सीटें जीतकर विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा पाना भाजपा की बड़ी चुनौती है। उपचुनावों में जरा भी ऊंच-नीच हुई तो जोड़तोड़ से बनी शिवराज सरकार संकट में आ जाएगी । ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया के लोगों को जगह देना बीजेपी की सियासी मजबूरी है।

आगे की राह

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी के पुराने नेताओं को दरकिनार कर नए नवेले पार्टी में शामिल चेहरों को मौका तो दे दिया है, लेकिन इससे पार्टी के पुराने नेताओं में असंतोष से इंकार नहीं किया जा सकता । विंध्य क्षेत्र में राजेंद्र शुक्ला के इलेक्शन मैनेजमेंट ,ग्वालियर-चंबल इलाके में तोमर के समर्थकों ने मेहनत और मालवा-निमाड़ क्षेत्र में कैलाश विजयवर्गीय पार्टी का चुनाव जिताने का मंत्र का भाजपा को सीटें दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन कैबिनेट विस्तार में उनके समर्थकों को ज्यादा महत्व नहीं मिल पाया है ।

मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया अपने समर्थकों को भरपूर जगह दिला पाने में कामयाब,संभव है कि वे अपने समर्थकों को महत्वपूर्ण विभाग दिलाने में भी सफल हो जाएं। इससे पहले वे खुद राज्यसभा में पहुंच ही गए हैं और माना जा रहा है कि जल्दी ही केंद्र में मंत्री भी बन जाएंगे।

अब देखना है कि आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में पार्टी के वरिष्ठ क्षत्रप नेताओं का असंतोष और नए नवेले पार्टी में शामिल नेताओं को मनचाहा अरमान पूरा होने का जोश का क्या असर देखने को मिलता है ।

Adv.

अब्दुल रशीद

Abdul Rashid is a well-known Journalist, Political Analyst and a Columnist on national issue. Cont.No.-7805875468, Email - editor@urjanchaltiger.in

Leave a Reply

Back to top button
Close
Close