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Karpoori Thakur : मरणोपरांत भारत रत्न पाने वाले जननायक कर्पूरी ठाकुर कौन थे?

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न पुरस्कार मिलेगा। केंद्र सरकार ने यह घोषणा की है। कर्पूरी ठाकुर एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने दो बार बिहार के 11वें मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया, पहले दिसंबर 1970 से जून 1971 तक, और फिर जून 1977 से अप्रैल 1979 तक। वह जन नायक के नाम से लोकप्रिय थे। ऐसे में जो लोग बिहार के संदर्भ से कम परिचित हैं उनके मन में यह सवाल उठेगा कि कर्पूरी ठाकुर कौन हैं?

कर्पूरी ठाकुर कौन थे?

कर्पूरी ठाकुर को बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय की लौ जलाने वाले नेता के रूप में जाना जाता है। कर्पूरी ठाकुर को जननायक कहकर संबोधित किया जाता है। उनका जन्म समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गांव में नाई समाज में 24 जनवरी 1924 को हुआ था। कर्पूरी ठाकुर का जन्म एक साधारण नाई परिवार में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने जीवन भर कांग्रेस विरोधी राजनीति की और अपनी राजनीतिक हैसियत अर्जित की। आपातकाल के दौरान भी तमाम कोशिशों के बावजूद इंदिरा गांधी उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकीं।

कर्पूरी ठाकुर 1970 और 1977 में मुख्यमंत्री बने

  • कर्पूरी टैगोर 1970 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।
  • उन्होंने 22 दिसंबर 1970 को पहली बार राज्य की कमान संभाली थी।
  • उनका पहला कार्यकाल केवल 163 दिनों तक चला।
  • 1977 की जनता लहर में जनता पार्टी की भारी जीत के बाद भी कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।
  • वह अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सके।
  • इसके बावजूद उन्होंने अपने दो साल से भी कम समय में समाज के गरीब लोगों की भलाई के लिए काम किया।
  • बिहार में मैट्रिक तक की शिक्षा मुफ्त कर दी गई।

वहीं राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करना अनिवार्य कर दिया गया है। अपने शासन काल में उन्होंने गरीबों, दबे और पिछड़ों के लिए कई काम किये जिससे बिहार की राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन आया। इसके बाद कर्पूरी टैगोर की राजनीतिक शक्ति में जबरदस्त वृद्धि हुई और वे बिहार की राजनीति में समाजवाद का एक प्रमुख चेहरा बन गये।

लालू-नीतीश कर्पूरी ठाकुर के शिष्य हैं

बिहार में समाजवादी राजनीति करने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार कर्पूरी ठाकुर के शागिर्द हैं। जनता पार्टी के दौर में लालू और नीतीश ककर्पूरी ठाकुर से राजनीति के गुर सीखे थे। ऐसे में जब बिहार में लालू यादव सत्ता में आए तो कर्पूरी ठाकुर के काम को आगे बढ़ाया। वहीं, नीतीश कुमार ने अति पिछड़े समुदाय के लिए भी काफी काम किया है।

बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर महत्वपूर्ण हैं

चुनाव विश्लेषकों के मुताबिक बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु 1988 में हो गई, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी वह बिहार के पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। गौरतलब है कि बिहार में पिछड़ों और अति पिछड़ों की आबादी करीब 52 फीसदी है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल प्रभाव फैलाने के लिए कर्पूरी ठाकुर का नाम बरकरार रखते हैं। यही कारण है कि 2020 में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में ‘कर्पूरी ठाकुर सुविधा केंद्र’ खोलने की घोषणा की थी।

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